जब भी प्रकृति राजनीति सीख ले
*जब प्रकृति भी राजनीति सीख ले* व्यंगात्मक लेख राजेन्द्र सिंह जादौन कुदरत, जो कभी अपनी सादगी और स्थिरता के लिए जानी जाती थी, आजकल इंसानों से ज्यादा बदल रही है। और वजह? इंसानों की नकल! प्रकृति सोच रही है जब इंसान हर पल रंग बदल सकता है तो मैं क्यों नहीं?” आज सत्ता के गलियारों में गिरगिटों की औकात खत्म हो चुकी है। पहले गिरगिट रंग बदलकर जंगल का राजा बन जाता था, लेकिन अब नेता लोग गिरगिट को ट्यूशन देने लगे हैं भाई, सिर्फ रंग मत बदलो, बयान भी बदलो! बरसात कब होगी? ये अब बादल नहीं, मंत्री तय करते हैं। धूप कब निकलेगी? ये सूरज नहीं, सत्ता के विज्ञापन वाले अभियान से तय होता है। कुदरत ने सोचा चलो, मैं भी ट्रेंड में रहूँ। इसलिए उसने आज नया रंग चढ़ा लिया। मौसम पूर्वानुमान अब विज्ञान से नहीं, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और चुनावी रैलियों से तय होता है। आज गिरगिट दुखी है। उसे लगता था रंग बदलने की कला उसका पेट पालने के लिए काफी है। लेकिन जब इंसान हर चुनाव, हर मंच पर गिरगिट से तेज रंग बदल रहा है, तो उसकी मार्केट वैल्यू गिर गई है। गिरगिट कह रहा है भाई, अब मुझे भी नेता बनना पड़ेगा वरना भूख से मरूँगा...